दावत विचार विमर्ष सामाजिक मुद्दे

मुसलमान और संवाद

विभिन्न धर्मों के लोगों के बीच संवाद वर्तमान समय की महत्वपूर्ण आवश्यकता है। फिर भी संवाद की अपेक्षाकृत कुछ-ही पहल मुसलमानों के द्वारा शुरू की गई है। ऐसा इसलिए है क्योंकि आम तौर पर मुसलमान धार्मिक मामलों में ग़ैर-मुस्लिमों के साथ दूरियाँ ख़त्म करने में विश्वास नहीं रखते हैं। वे उन्हें मुसलमान बनाने में विश्वास रखते हैं और उनके अंदर दूसरे धर्म के मानने वालों से श्रेष्ठ होने का एक गहरा एहसास है।इसलिए आमतौर पर वो दूरियाँ ख़त्म करने के किसी भी संवाद में शामिल होना पसंद नहीं करते हैं।

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गैर-मुस्लिमों के लिए दुआ करना

मुसलमानों में आम ख्याल है कि कुरआन की निम्नलिखित आयत ने इस बात से रोक दिया है कि गैर-मुस्लिमों के लिए क्षमा (मग़फिरत) की दुआ की जाये: مَا كَانَ لِلنَّبِيِّ وَالَّذِينَ آمَنُوا أَن يَسْتَغْفِرُوا لِلْمُشْرِكِينَ وَلَوْ كَانُوا أُولِي قُرْبَىٰ مِن بَعْدِ مَا تَبَيَّنَ لَهُمْ أَنَّهُمْ أَصْحَابُ الْجَحِيمِ  ٩: ١١٣    नबी और उसके मानने वालों के…

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क्या गैर-मुस्लिमों से दोस्ती नहीं की जा सकती ?

कुरआन की निम्नलिखित आयत की बुनियाद पर कुछ मुसलिम विद्वान (आलिम)[1] यह राय रखते हैं कि मुसलमानों को गैर-मुस्लिमों से मित्रता नहीं रखनी चाहिए, बल्कि उन्हें उनके लिए दुश्मनी और नफ़रत भरा रवैया रखना चाहिए: لَّا يَتَّخِذِ الْمُؤْمِنُونَ الْكَافِرِينَ أَوْلِيَاءَ مِن دُونِ الْمُؤْمِنِينَ [٣: ٢٨]  ईमान वाले अब मुसलमानों को छोड़कर इन काफिरों को अपना दोस्त ना बनायें। (3:28)…