गैर-मुस्लिमों को ज़कात

कुछ लोगों का मानना है कि ज़कात किसी गैर-मुस्लिम को नहीं दी जा सकती। यह राय ठीक नहीं है। कुरआन की निम्नलिखित आयत बताती है कि ज़कात कहाँ-कहाँ खर्च की जा सकती है: إِنَّمَا الصَّدَقَاتُ لِلْفُقَرَاءِ وَالْمَسَاكِينِ وَالْعَامِلِينَ عَلَيْهَا وَالْمُؤَلَّفَةِ قُلُوبُهُمْ وَفِي الرِّقَابِ وَالْغَارِمِينَ وَفِي سَبِيلِ اللَّهِ وَابْنِ السَّبِيلِ  فَرِيضَةً مِّنَ اللَّهِ  وَاللَّهُ عَلِيمٌ حَكِيمٌ…

क्या गैर-मुसलमानों से सूद लिया जा सकता है ?

कुछ विद्वानों (आलिमों) की राय हैं कि गैर-मुसलमानों से सूद लिया जा सकता है। यहाँ यह समझ लेना चहिए कि इंसानों से सूद लेना हराम किया गया है, चाहे वह मुस्लिम हो या गैर-मुस्लिम क्योंकि यह एक अनैतिक अनुबंध (गैर-अखलाकी माएहदा) है। जो चीज़ें अनैतिक हैं वह मना हैं, चाहे मुसलमानों से संबंधित हों या गैर-मुस्लिमों…

क्या सभी गैर-मुस्लिम नरक में जायेंगे ?

यह आम धारणा (तसव्वुर) है कि सारे गैर-मुसलमानों का नरक में जाना तय है। कुरआन की कुछ आयात को इस बात का आधार बनाया जाता है, जैसे की निम्नलिखित आयत: إِنَّ الَّذِينَ كَفَرُوا مِنْ أَهْلِ الْكِتَابِ وَالْمُشْرِكِينَ فِي نَارِ جَهَنَّمَ خَالِدِينَ فِيهَا ۚ أُولَٰئِكَ هُمْ شَرُّ الْبَرِيَّة   ٩٨: ٦  अहले किताब (यहूदी और ईसाई) और मुशरिकीन…

मुसलमानों और गैर-मुस्लिमों के बीच विरासत का कोई संबंध नहीं ?

निम्नलिखित हदीस की बुनियाद पर कुछ विद्वानों (आलिमों) का मानना है कि मुसलमानों और गैर-मुसलमानों में विरासत का कोई संबंध नहीं हो सकता:[1] उसामा इब्न ज़ैद से रवायत हैं कि रसूलअल्लाह (स.व) ने फरमाया: “एक मुसलमान किसी काफ़िर का वारिस नहीं हो सकता और ना ही कोई काफ़िर किसी मुसलमान का वारिस हो सकता है।”[2] आज…

क्या गैर-मुस्लिमों से दोस्ती नहीं की जा सकती ?

कुरआन की निम्नलिखित आयत की बुनियाद पर कुछ मुसलिम विद्वान (आलिम)[1] यह राय रखते हैं कि मुसलमानों को गैर-मुस्लिमों से मित्रता नहीं रखनी चाहिए, बल्कि उन्हें उनके लिए दुश्मनी और नफ़रत भरा रवैया रखना चाहिए: لَّا يَتَّخِذِ الْمُؤْمِنُونَ الْكَافِرِينَ أَوْلِيَاءَ مِن دُونِ الْمُؤْمِنِينَ [٣: ٢٨]  ईमान वाले अब मुसलमानों को छोड़कर इन काफिरों को अपना दोस्त ना बनायें। (3:28)…

मुस्लिम और ग़ैर मुस्लिम

इस्लाम के सिवा बाक़ी तमाम मज़हबों के मानने वालों को ग़ैर-मुस्लिम कहा जाता है। यही शब्द/परिभाषा उन लोगों के लिए भी है जो किसी दीन या मज़हब को नहीं मानते। ये कोई अपमान का शब्द नहीं है, बल्कि सिर्फ इस वास्तविकता का इज़हार है कि वो इस्लाम के मानने वाले नहीं हैं। उन्हें आम तौर पर काफ़िर भी कह दिया जाता है, लेकिन हमने अपनी किताबों में…