मुसलमान और संवाद

विभिन्न धर्मों के लोगों के बीच संवाद वर्तमान समय की महत्वपूर्ण आवश्यकता है। फिर भी संवाद की अपेक्षाकृत कुछ-ही पहल मुसलमानों के द्वारा शुरू की गई है। ऐसा इसलिए है क्योंकि आम तौर पर मुसलमान धार्मिक मामलों में ग़ैर-मुस्लिमों के साथ दूरियाँ ख़त्म करने में विश्वास नहीं रखते हैं। वे उन्हें मुसलमान बनाने में विश्वास रखते हैं और उनके अंदर दूसरे धर्म के मानने वालों से श्रेष्ठ होने का एक गहरा एहसास है।इसलिए आमतौर पर वो दूरियाँ ख़त्म करने के किसी भी संवाद में शामिल होना पसंद नहीं करते हैं।

सैय्यदा आइशा (रज़ि.) की उम्र

आम तौर पर माना जाता है कि पैग़म्बर मुहम्मद स.अ.व. के साथ निकाह के वक़्त उम्मुल मोमिनीन (मुसलमानों की माँ) सैय्यदा आइशा (रज़ि.) की उम्र 6 साल थी। ये निकाह पैग़म्बर मुहम्मद स.अ.व. की पहली पत्नी सैय्यदा खदीजा (रज़ि.) की मृत्यु के बाद मक्के में हुआ था। सैय्यदा आइशा (रज़ि.) विदाई इसके तीन साल बाद…

मेरा नाम – जावेद अहमद ग़ामिदी

मेरे नाम का मामला भी अजीब है। वालिदा को जावेद पसंद था। पैदाईश के बाद वालिद अपने शेख़ से दुआ कराने के लिए लेकर गए तो उन्हों ने फ़रमाया: उस का नाम हम दरवेशों के तरीक़े पर होना चाहिए। उसे काकू शाह कहा करो। मैं देख रहा हूँ कि बादशाह उस के पास नियाज़ मंदाना हाज़िर होंगे। मेरी छोटी ख़ाला बरसों वालिदा के पास रही…

علما کی اصل ذمہ داری

سید منظور الحسن اللہ تعالیٰ نے علما پر جو ذمہ داری عائد کی ہے، وہ اس کے سوا کچھ نہیں ہے کہ وہ لوگوں کو’’انذار‘‘ کریں ، یعنی آخرت کے عذاب سے خبردار کریں۔ ارشاد فرمایا: ’’اور سب مسلمانوں کے لیے تو یہ ممکن نہ تھا کہ وہ اِس کام کے لیے نکل کھڑے ہوتے،لیکن…

इस्लाम और राष्ट्रीयता (क़ौमियत)

जावेद अहमद ग़ामिदी, मकामात अनुवाद: जुनैद मंसूरी रंग, नस्ल, भाषा, सांस्कृतिक परम्पराओं और क्षेत्र के आधार पर एक राष्ट्र (क़ौम) होने की भावना इन्सान के स्वभाव में पायी जाती है। सारे इन्सान एक ही मनुष्य की संतान हैं लेकिन अपने रिश्तेदारों से जो निकटता महसूस होती है वह दूसरे इंसानों से महसूस नहीं होती। यही मामला…

ईसा (स.व) की वापसी के बारे में…

मुसलमानों में आम तौर पर माना जाता है कि जब दुनिया का अंत करीब होगा तो ईसा (स.व), जिनको दुनिया से ज़िन्दा उठा लिया गया था, वापस आयेंगे और उनका यह दूसरी बार आना असल में कयामत की एक निशानी होगा। इस मुद्दे का विश्लेषण (तजज़िया) करते हुए ग़ामिदी साहब लिखते हैं: [1] जहाँ तक उन…

किस्मत और पूर्वनियति

कुछ मुसलमान मानते हैं कि भाग्य तो पहले से लिखा हुआ है। अगर ऐसा है तो फिर कुछ लोग उन कर्मों (अमाल) के लिए नरक में क्यों जायेंगे जो उनकी किस्मत में पहले से लिखे हुए थे ? इस बारे में तो वह कुछ नहीं कर सकते। इसके अलावा यह सवाल भी पैदा होता है कि…

इस्तिखारा और ख़वाब

लोग आम तौर पर यह मानने लगे हैं कि इस्तिखारे के ज़रिये वह किसी भी मामले में यकीनी तौर पर अल्लाह की मर्ज़ी जान सकते हैं। यहाँ तक कि इसके लिए वह पेशेवर इस्तिखारे करने वाले के पास भी जाते हैं। यह बात समझने की ज़रूरत है कि इस्तिखारा और कुछ नहीं बल्कि अल्लाह से…

ख़िलाफ़त

["इसलाम और रियासत – एक जवाबी बयानिया” पर ऐतराज़ात के जवाब में लिखा गया लेख] जावेद अहमद ग़ामिदी  अनुवाद: आक़िब ख़ान इसमें शक नहीं कि “ख़िलाफ़त” का लफ़्ज़ कई सदीयों से “इस्तिलाह”* के तौर पर इस्तेमाल होता रहा है, लेकिन ये हरगिज़ कोई “मज़हबी इस्तिलाह” नहीं है। मज़हबी इस्तिलाह राज़ी, ग़ज़ाली, मावरदी, इब्न हज़म और इब्न ख़लदून** के बनाने से नहीं बनती और ना ही हर वो लफ़्ज़ जिसे मुसलमान किसी ख़ास मायने में इस्तेमाल करना…

इसलाम और रियासत (एक जवाबी बयानिया) – The Counter Narrative

जावेद अहमद ग़ामिदी  अनुवाद: आक़िब ख़ान इस समय जो हालात कुछ इंतिहापसंद तहरीकों ने अपनी कार्रवाइयों से इसलाम और मुसलमानों के लिए पूरी दुनिया में पैदा कर दी है, ये उसी विचारधारा का बुरा नतीजा है जो हमारे मज़हबी मदरसों में पढ़ा और पढ़ाया जाता है, और जिसका प्रचार इस्लामी तहरीकें और मज़हबी सियासी संगठन…