गैर-मुस्लिमों को ज़कात

कुछ लोगों का मानना है कि ज़कात किसी गैर-मुस्लिम को नहीं दी जा सकती। यह राय ठीक नहीं है। कुरआन की निम्नलिखित आयत बताती है कि ज़कात कहाँ-कहाँ खर्च की जा सकती है: إِنَّمَا الصَّدَقَاتُ لِلْفُقَرَاءِ وَالْمَسَاكِينِ وَالْعَامِلِينَ عَلَيْهَا وَالْمُؤَلَّفَةِ قُلُوبُهُمْ وَفِي الرِّقَابِ وَالْغَارِمِينَ وَفِي سَبِيلِ اللَّهِ وَابْنِ السَّبِيلِ  فَرِيضَةً مِّنَ اللَّهِ  وَاللَّهُ عَلِيمٌ حَكِيمٌ…

क्या गैर-मुसलमानों से सूद लिया जा सकता है ?

कुछ विद्वानों (आलिमों) की राय हैं कि गैर-मुसलमानों से सूद लिया जा सकता है। यहाँ यह समझ लेना चहिए कि इंसानों से सूद लेना हराम किया गया है, चाहे वह मुस्लिम हो या गैर-मुस्लिम क्योंकि यह एक अनैतिक अनुबंध (गैर-अखलाकी माएहदा) है। जो चीज़ें अनैतिक हैं वह मना हैं, चाहे मुसलमानों से संबंधित हों या गैर-मुस्लिमों…

व्यावसायिक ब्याज़ (Commercial Interest)

 कुछ लोग सोचते हैं कि व्यापारिक उपक्रमों (commercial enterprises) से लिया जाने वाला सूद निषिद्ध (हराम) नहीं है। इस ग़लतफहमी को दूर करते हुए ग़ामिदी साहब लिखते हैं[1]: यह साफ रहना चाहिए कि रिबा  का मतलब इससे तय नहीं होता कि क़र्ज़ निजी ज़रूरत, व्यापार या फिर कल्याण परियोजना (welfare scheme) के लिए लिया गया है। तथ्य यह है कि अरबी भाषा…

किसी नेक काम के लिए सूद लेना 

कुछ लोगों का मानना है कि सूद (ब्याज़) आधारित योजनाओं में पैसा लगाया जाना चाहिए ताकि कमाये गए सूद से जन-कल्याण परियोजनाओं (public welfare schemes) में निवेश (invest) किया जा सके और जरूरतमंद लोगों की मदद की जा सके। यहाँ यह बात साफ़ कर लेनी चाहिए कि सूद लेना इस्लाम में पूरी तरह मना है चाहे वह किसी…

सूद और किराए का फ़र्क

कुछ लोग सूद (ब्याज) लेने को सही साबित करने के लिए कहते हैं कि जिस तरह किसी चीज़ को इस्तेमाल के लिए लेने वाले से किराया लिया जाता है उसी तरह सूद भी उधार दिए गए पैसों के किराए समान ही है। दूसरे शब्दों में कहें तो वह तर्क देते हैं कि जिस तरह एक व्यक्ति…

क्या इस्लाम एक आर्थिक व्यवस्था भी देता है ?

ज़्यादातर लोग सोचते हैं कि इस्लाम हमें एक पूरी आर्थिक व्यवस्था (economic system) देता है और ज़रूरत सिर्फ अनुकूल हालात में उसे लागू करने की है। यह धारणा (तसव्वुर) सही नहीं है। इस बात को समझना चाहिए कि अल्लाह ने इंसान को अक्ल और तर्क से नवाज़ा है और इसके साथ ही अच्छाई और बुराई में फ़र्क करने…

यतीम पोते की विरासत

लेखक: जावेद अहमद ग़ामिदी  अनुवाद: मुहम्मद असजद पोते की विरासत में दादा और दादा की विरासत में पोते का कोई हिस्सा साफ तौर पर तो कुरआन में बयान नहीं हुआ, लेकिन أولاد (औलाद) और آبا (आबा) के शब्दों में लुग़त (शब्दकोश) और उर्फ़ (इस्तेमाल), दोनों के एतबार से दादा और पोता भी शामिल हो जाते…